सुप्रीम कोर्ट ने 105 साल के एक हत्या के दोषी को बड़ी राहत दी है। 38 साल से चल रहे इस मामले में कोर्ट ने उनकी ज़मानत को स्थायी कर दिया है। कोर्ट ने साफ किया कि अब उन्हें किसी भी हाल में वापस जेल नहीं भेजा जाएगा।

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने 105 साल के एक बुज़ुर्ग को बड़ी राहत दी है, जिन्हें भारत का सबसे बुज़ुर्ग दोषी माना जा रहा है। हत्या के एक मामले में दोषी ठहराए गए इस शख्स की ज़मानत को कोर्ट ने स्थायी कर दिया है। यह फैसला उनकी बेहद ज़्यादा हो चुकी उम्र को देखते हुए लिया गया है। यह मामला करीब 38 सालों से कानूनी दांव-पेंच में फंसा हुआ था। आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट ने इस लंबी लड़ाई पर विराम लगा दिया। कोर्ट ने पहले उन्हें ज़मानत दी थी और अब उस ज़मानत को स्थायी बना दिया गया है, जिसका मतलब है कि उन्हें अब जेल वापस नहीं जाना होगा।

कोर्ट ने क्या कहा?

इस मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने एक बेहद अहम टिप्पणी की। उन्होंने साफ किया कि अगर दोषी ने अपनी उम्रकैद की सज़ा की औपचारिक अवधि पूरी नहीं भी की है, तो भी उन्हें वापस हिरासत में नहीं लिया जाएगा। कोर्ट का यह रुख इस मामले को असाधारण बना देता है। कोर्ट के इस फैसले का आधार पूरी तरह से मानवीय है। 105 साल की उम्र में किसी व्यक्ति को सलाखों के पीछे रखने का कोई औचित्य नहीं बनता। ज़ाहिर है, कोर्ट ने भी इसी पहलू को सबसे ज़्यादा महत्व दिया।

38 साल की लंबी कानूनी लड़ाई

यह कोई सामान्य मामला नहीं था, जहां किसी को कुछ सालों में इंसाफ या सज़ा मिल जाए। यह शख्स पिछले 38 सालों से इस हत्या के मामले का सामना कर रहा था। इतने लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया में उलझे रहना अपने आप में एक सज़ा जैसा है। इस फैसले के साथ ही, एक व्यक्ति की ज़िंदगी भर चली कानूनी लड़ाई का अंत हो गया है। हालांकि यह आज़ादी उन्हें ज़िंदगी के उस पड़ाव पर मिली है, जब उम्र 100 का आंकड़ा पार कर चुकी है। यह फैसला न्याय व्यवस्था में मानवीय पहलुओं के महत्व को भी रेखांकित करता है।